नन्ही सी जान की कथा....
- प्राची प्रवीण आंधळकर.
नन्हें
मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है
मुट्ठी
में है तकदीर हमारी
हमने
किस्मत को बस में किया है
ये गीत
के लब्ज कवि शैलेन्द्र के है. आशा भोसले और मोहम्मद रफी आवाज मैं इस गीत को शंकर
जयकिशन ने संगीत दिया है. साल १९५४ में राज कपूर निर्मित ''बूट पॉलिश''
ये
सिनेमाका यह गीत है. अनेक ऐतिहासिक
पुरस्कार भी इस फ्लिम को मिले है. इस चित्रपट की खासियत ही वैसी थी की जिससे खुश
होकर प्रेक्षकों ने इस फ्लिम को नवाजा है.
इस
फ्लिम मैं नन्हे बालको की वो जिंदगी बताई है जिसमे उन बच्चों के माँ-बाप के निधन
के बाद वो बच्चे अपनी मौसी पर निर्भर होते है. पर मौसी के हालत उतने अच्छे नहीं
होते है उस वजह से वो उनको एक दारू के दुकानदार के भरोसे छोड़ के जाती है. वो उनको
बूट पॉलिश, कपडे बिकना, इस तरह
के छोटे मोठे काम उन्होंने बच्चों को सिखाये. उन बच्चों पर जो हालत आये
उनको उन्होंने बहोत जिद्द से मात दी है. आज भी यही परिस्थिती हमारे समाज में दिखती
है. आज इस फिल्म को ६५ साल पुरे होने के बावजूद भी यह स्थिती का सामना करने की हमारे
बच्चो को जरुरत पढ़ती है. ये बात हमारे देश के लिए शर्मनाक बात है. हमारे देश के
संविधान में बच्चो को लेकर अधिक संवेदनशील नियम बनाये है. पर भ्रष्टाचार के वजह से
आजतक उन नियमो का पालन नहीं होता. आज भी सड़क पर ऐसे कई परिवार के बच्चे है जिनके
पास हमारी शिक्षण संस्था नहीं पोहच पाती है. सड़क पर अपना रोजगार ढूंढकर अपने जीवन
का उदरनिर्वाह करते है. कई बार गांधी चीजो के और बढ़ते जाते है और अपना स्वाभिमान
भी खो बैठते है.
भोली-भाली
मतवाली आँखों में क्या है
आँखों
में झूमे उम्मीदों की दिवाली
आने
वाली दुनिया का सपना सजा है
इन
बच्चो की आखो में कई सपने है पर उसे पूरा करने के लिए हमारी सरकार अधूरी है. आज
टेलिव्हीजन जैसा उत्तम मार्ग है जिसमे कई बच्चे अपना हुन्नर दिखाकर अपने सपनो की
और उड़ान भरते है. पर सड़क बेबसों के तरह दिन-रात मेहनत करके अपनी दिनचर्या करते है.
उन बच्चों को तो खेलने का भी समय नहीं मिलता. धुप हो या छाव हो काम तो करना ही
पड़ेगा इस मानसिकता को लेकर वो जीते है. कई बच्चे रोजगारी ज्यादा मिले इस लिए फटाका
के कंपनी मैं काम करते है. कई बार फटाका फुटकर स्फोट होता है और उनकी जान भी चली
जाती है पर एक दिन सुकून की दीवाली मनाने का मौका नहीं मिलता. यही है सच्चाई
भविष्य के नौजवान की जो अपना बचपन सुकून से जी नहीं सकता.
भीख में जो
मोती मिले लोगे या न लोगे
ज़िन्दगी के आंसुओं का बोलो क्या करोगे
भीख में जो मोती मिले तो भी हम न लेंगे
ज़िन्दगी
के आंसुओं की माला पहनेंगे
मुश्किलों से लड़ते-फिरते जीने में मज़ा
है
ऐसी स्थितीओ मैं भी उन बच्चों की जिद्द कम नहीं
होती. किसीने भिक दी तो उसका स्वीकार नहीं करेंगे. यह बात उन्होंने पक्की करके रखी
है. गिर कर भी उठकर सामना करने का जज्बा वो रखते है. यही उनका स्वाभिमान है जो
डटकर मुश्किलो का सामना करते है. यही भारत देश
के संस्कार है. आज इस परिस्थिती का सामना वो खुद करते है. सुबह काम करके
रात मैं पाठशाला सिखने जाते है. पढाई करके अपने उच्च धेय्य की और बढ़ते है.
हमसे न छुपाओ
बच्चों हमें तो बताओ
आने वाली
दुनिया कैसी होगी समझाओ
आने वाली दुनिया में सबके सर पे
ताज होगा
न भूखों की भीड़ होगी, न
दुखों का राज होगा
बदलेगा
ज़माना ये सितारों पे लिखा है
आज हमारे देश
का भविष्य भारत सरकार के अभियान को लेकर जीता है. गाव हो या शहर हो, गोरा
हो या काला हो, किसीभी धर्म का हो पर उसे समान अधिकार मिलता है. सर्व समान
शिक्षा अभियान , स्वच्छ भारत अभियान, साक्षरता अभियान के अंतर्गत आज
का समाज विकसित हो रहा है. आने वाली पिढिओ मैं शिक्षा का सही महत्व सभी को समजेगा.
न कोई भूखा होगा, न कोई अशिक्षित होगा कोई समाज बदल रहा है.
हमने किस्मत
को बस में किया है....

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